कितने सारे ख़त लिखे थे तुम्हे..

कितने सारे ख़त लिखे थे तुम्हे..
कभी तुम मिली नहीं उसकी फरियाद..
कभी रूठ कर चली गयी उसका अफ़सोस..
२ रुपए के उस स्टेम्प को इतने प्यार से लगाया था
मानो तुम्हारे होठों को छू रहा था जैसे..

कभी पेन ख़यालो के रास्तो से हो कर द्धूंधली यादो में खो गयी
और कभी कलम सुखी तो आँसुओ से ही सियाही भर ली
फिर कोशिश की.. फिर रुका
फिर लिखता चला गया
सोच कर गभराया की तुम पढ़ोगी तो क्या कहोगी,
क्या करोगी.. क्या सोचोगी..

पढ़ोगी भी या नाहिं?

कितने सारे ख़त लिखे थे तुम्हे..
एक भी कभी पोस्ट नहीं कर पाया

- क्षितिज

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